Vikrant's
Wednesday, August 24, 2011
भ्रष्ट है सभी
पर फिर क्यूँ हर बार हम उन्ही को चुनते है ?
अगर कहते है हम की नहीं है चुना हमने
फिर सोचो क्या गए थे हम वोट देने ?
हम में भी है भ्रष्ट कही क्यूँ ये भूल जाते है
जो बैठे है वहां खुर्सियों पे वो हम में से ही कुछ लोग है
अपने सहुलियेत के हिसाब से मायने भ्रष्टाचार के बदल देते है
फिर अपनी हरकतों को सही बताने की बहाने हम ढूंढते है
रोकेंगे अगर हम खुद में छुपे इस भ्रष्टाचार को
शायद कर पायेंगे कम हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार को
Tuesday, April 26, 2011
Anna ka Anshan
I think we need to change our mindset so that we can be successful in making India a good country to live
अन्ना के अनशन ने क्या जनता को है जगा दिया ?
भ्रष्टाचार की जुंग में क्या कदम हम ने है बढ़ा दिया ?
क्या एक कानून बदल्देगा सोच इतनी हमारी ?
बुरी लगने लगेगी क्या 'tabel के निचे ' की कमाई ?
क्या छोड़ देंगे हम बहाने बनाना घुस देने के ?
या छोड़ देंगे कानून तोड़ना अपनी सहूलियत के लिए ?
भ्रष्टाचार को मिटने के लिए कानून के साथ पड़ेगा हमें खुद को बदलना
बंद करना होगा अपनी सहूलियत के लिए क़ानून को तोड़ना
जब तक नहीं करेंगे ये हर बार किसी नए अन्ना को आना होगा
हर बार फिर नया कानून हमें बनाना होगा … नया कानून बनाना होगा
Wednesday, December 15, 2010
Will never loose my hope, Will not shy away from the fight
Will never loose my hope, Will not shy away from the fight
If I'm sure the direction I'm stepping is right
Its not something I want to prove to the world
But sometimes your heart needs to be heard
You either can live trying to fullfil your dreams
Or just keep on fighting for the material things
Its your life how to live what you decide
You can live it to the fullest or just try and survive...
Monday, October 18, 2010
Life ......
बैठ मेरे साथ देख कैसी होती है ज़िन्दगी
देख कभी मुस्कुराहटों को आसुओं मे ढलते हुए
कभी देख आसुओं को मुस्कुराहटों में खिलते हुए
मिलेंगे क्या रंग इतने तेरी उस जन्नत मे ?
देख इंसान को लड़ते तेरी लिखी उस तक़दीर से ... या देख इंसान को लड़ते तेरी लिखी उस तक़दीर से
Wednesday, October 6, 2010
Aarakshan ..
पिछड़ों को आगे करने का दम भारती है सरकार
फिर भी न जाने पिछड़ों की संख्या है बरक़रार
कभी आरक्षण तो कभी योजनाएँ कई
फिर भी न जाने क्यूँ इस्तिथि है वही
करती नहीं क्यूँ सरकार कुछ ऐसा
जाति नहीं आरक्षण की बुनियाद हो पैसा
पिछड़ों को चाहिये सम्मान समाज में
दूर करनी चाहिये दूरियां है जो दिल में
Tuesday, September 21, 2010
रोज़गार के नाम पर ज़मीन हमारी छीनली
दिखा के ख्वाब कई नीदें हमारी छीनली
यकीन करूं में किसपे सभी ने मुझे लूटा है
नारा चाहे कुछ भी हो वो बस पैसे का भूखा है
जनता की पार्टी हो या आम आदमी का हाथ
हर कोई बस देता है गरीब के पेट पे लात
हुआ करते थे समाज सेवी कभी नेता
आज कल तो बस समाज से सेवा है लेता
जागे नहीं आज तो जाने कहाँ हम होंगे
शायद फिर स्कूल में भ्रष्टाचार के पाठ होंगे