Tuesday, September 21, 2010

रोज़गार के नाम पर ज़मीन हमारी छीनली

दिखा के ख्वाब कई नीदें हमारी छीनली

यकीन करूं में किसपे सभी ने मुझे लूटा है

नारा चाहे कुछ भी हो वो बस पैसे का भूखा है

जनता की पार्टी हो या आम आदमी का हाथ

हर कोई बस देता है गरीब के पेट पे लात

हुआ करते थे समाज सेवी कभी नेता

आज कल तो बस समाज से सेवा है लेता

जागे नहीं आज तो जाने कहाँ हम होंगे

शायद फिर स्कूल में भ्रष्टाचार के पाठ होंगे

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